यात्रा का समय- 25-28 मई 2018
कुल खर्च 18000
तो शुरू करते हैं दोस्तों, कई दिनों से हम तीनों दोस्त कहीं घूमने जाने का प्लान कर रहे थे, रोज रोज की बोरिंग लाईफ से ऊब चुके थे तो हमने 3-4 दिनों के लिए उत्तराखण्ड में कहीं घूमने का सोचा..और फिर लास्ट वीकेंड पर हम लोग नैनीताल के लिए निकल पड़े.. 25 तारीख को हमे दोपहर में निकलना था.12 बजे ही संदीप का फोन आया कि वो रेवाड़ी पहुँच गया है और रोहित को लेकर 30 मिनट में मेरे घर पहुँच जायेंगे. बता दूँ कि संदीप नारनौल से आ रहा था और हमे रेवाड़ी से रोहित की गाड़ी (वैगनआर) लेकर निकलना था.पर मै अभी भी अपने काम से फ्री नहीं हुआ था, अभी मुझे last sight attend करना बाकी था, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ हम तीनों ATM INDUSTRY में काम करते थे field job थी, वो दोनों कैश आफिसर और मै इंजीनियर. हमारी duty 24×7 थी. कोई fix time नही जब किसी ATM के खराब होने की call आती call centre से तो निकल पडते फिल्ड में... उस दिन फ्री होकर घर पहुचने मे मुझे 2 बज गए.. रोहित और संदीप पिछले एक घंटे से मेरा इंतजार कर रहे थे ये बात अलग है कि वो मेरे गांव के ठेके पर पहुँच कर अपना कोटा पूरा कर रहे थे. 20 मिनट में तैयार हो कर अपना बैग लेकर मै घर से बाहर निकला और इन्हें फोन किया, 2 मिनट में ये आ पहुंचे.और बोले इतनी देर इंतज़ार करवाने की सजा ये है कि अब गाड़ी तू चलायेगा. रोहित 2 बोतल बीयर 🍺🍻की पी चुका था और 2 बची हुई थी और 1 दारू की बोतल भी रखी हुई थी जिसमें से 1-2 पैग संदीप भी ले चुका था..अपना बैग रखने के लिए जैसे ही मैंने डिग्गी खोली तो देखा कि उसमें पानी का कैंपर रखा है और उसमें बर्फ़ जमीं हुई थी मतलब बंदे enjoyment का पूरा सामान ले कर चले थे, खैर अब राम का नाम लेकर मैंने गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए मंजिल की ओर...
दिल्ली पार कर हम आगे बढे जा रहे थे, गाजियाबाद में Dominoz Pizza पहुँच कर pizza order किया, पिज्जा खाकर कुछ देर बाद वहाँ से निकले, अब तक रोहित अपनी सारी बीयर पी चुका था, मुरादाबाद पहुचने से पहले उसे फिर चुल हुई बीयर की, अब दिक्कत ये कि हाइवे पर कोई ठेका दिखाई नहीं दे रहा था, काफी आगे जाने पर एक आदमी से पूछताछ की तो उसने ठेके का रास्ता बताया, उसके लिए अब हमे हाइवे के दूसरी तरफ कुछ दूर रोंग साइड गाड़ी चलाकर फिर अंदर किसी गाँव को जाने वाली सड़क पर एक किलोमीटर दूर ठेका मिला. वहाँ पहुंचे तो ठेके के बाहर झगड़ा हो रहा था, जल्दी से 2 बीयर लेकर हम वहाँ से खिसक लिए क्योंकि एक तो अंधेरे का वक्त, सुनसान जगह और दूसरा राज्य, हम किसी लफड़े मे नही पडना चाहते थे. थोड़ी देर बाद हम मुरादाबाद पहुंचे, हाइवे से मुरादाबाद शहर थोड़ा अंदर है शायद 3-4 किलोमीटर. और हमने आज रात यही रूकने का प्लान किया क्योंकि यहाँ पहुचते पहुंचते हमे 10 बज गए थे और नैनीताल अभी काफी दूर था.अब हम गाड़ी साइड में लगाकर होटल ढूंढने लगे रेलवे स्टेशन के आसपास, तभी एक पान वाले ने हमे इशारा करके बुलाया और थोड़ी दूर खडी़ 2 लडकियों की ओर इशारा करके बोला ये चाहिए क्या साहब? वो दल्ला था.. हमनें कहा नहीं भाई हम तो पहले ही अपनी अपनी से पीछा छुडा कर आए हैं 😜. थोड़ी देर बाद हमे होटल मिल गया और हम खाना खा कर 12 बजे तक सो गए. सुबह 5 बजे उठकर नहा धोकर हम 6 बजे होटल से निकल लिए. हमने रामपुर की तरफ ना जाकर दुसरा रुट लिया जो जिम कार्बेट के पास से होता हुआ कालाढूंगी होकर नैनीताल जाता है. थोड़ी दूर जाकर हम एक होटल पर रुके नाश्ता करने के लिए, नाश्ते में हमने आलू पराठे और दही लिया. जल्दी ही वहाँ से निकल पड़े. थोड़ा आगे चलकर हम जाम मे फंस गए. ये जाम बाजपुर के पास लगा हुआ था यहाँ हमारा एक घंटा खराब हुआ. यहाँ से निकल कर कालाढूंगी होते हुए खुर्पाताल पहुंचे, अब तक रास्ता बड़ा मनमोहक हो चुका था. यहाँ थोड़ी देर रुककर फोटोग्राफी की पास ही माता रानी का छोटा सा मंदिर था वहां हाथ मुंह धोकर दर्शन किए.और फिर आगे बढ़ चले.
चित्र - खुर्पाताल
थोड़ी ही देर में हम नैनीताल पहुँच गए, बडा़ ही सुहाना मौसम था और नजारे मनमोहक. एंट्री करते टाइम थोड़ा जाम था गाडियाँ धीरे धीरे सरक रही थीं, 15 -20 मिनट बाद एक बडे़ से मैदान के पास पहुचे और गाड़ी पार्किंग में लगाई. ये मैदान बिलकुल नैनी झील के साथ ही है.अब 11 बज चुके थे, थोड़ा घूम फिर कर पास ही एक रेस्टोरेंट में खाना खाया. फिर कुछ देर बोटिंग की. झील के किनारे ही एक मंदिर है वहां धोक लगाई. वहाँ स्काउट्स का एक ग्रुप भी आया हुआ था घूमने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा से, कुछ देर उनसे बातचीत व हंसी मजाक की. और हाँ यही एक मजेदार वाक्या भी हुआ, हुआ यूँ की जब हम उन स्काउट्स के पास बैठे थे तब दो लडकियां पास आकर एक खाली रिक्शा की ओर इशारा करके बोली ये रिक्शा वाला किधर गया? तभी तपाक से संदीप ने जवाब दिया: मैडम ये self service रिक्शा है आप ले जा सकतीं हैं ये सुनकर सभी हंसने लगे आगे वो लडकिया भी हंसते हुए वहां से निकल ली. फिर कुछ देर माल रोड पर घुमे फिरे, और शाम 5:30 बजे वहां से निकल लिए कैंची धाम के लिए.
कैंची धाम में नरेश व संदीप
कैंची धाम मे बाबा नीम करोरी महाराज जी की समाधि है, वे हनुमान जी के भक्त थे और बहुत ही पहुंचे हुए संत थे.यहाँ हनुमान जी व माता रानी का मंदिर बना हुआ है. सुना है कि 🍎 (apple) के स्टीव जॉब्स भी यहाँ आए थे कई सालों पहले तब महाराज जी जीवित थे और उन्होंने स्टीव जॉब्स को खाने के लिए एक सेब दिया जो पहले से ही थोड़ा सा खाया हुआ था, तब से स्टीव जॉब्स ने अपनी कंपनी का लोगो खाए हुए सेब को रखा. Facebook ke CEO मार्क जुकरबर्ग भी यहाँ आ चुके हैं. उनको यहाँ आने के लिए भी स्टीव जॉब्स ने ही प्रेरित किया था.
कैंची धाम में दर्शन करके कुछ देर रुककर वहां से अल्मोड़ा के लिए चल पड़े.. थोड़ी दूर आगे जाने पर जंगल में कहीं कहीं 🔥 लगी हुई थी पर वो सड़क से काफी दूर थी तो हमें कोई खतरा नहीं था. कैंची धाम से कुछ दूर जाकर सड़क दो तरफ जाती है बायीं साइड रानीखेत के लिए व दायीं साइड अल्मोड़ा के लिए, हम अल्मोड़ा की ओर चल दिए वैसे हमारा पहले से कोई प्लान फिक्स नहीं था कहाँ जाना है.हम यूँ ही चलते जा रहे थे जहाँ अंधेरा हो जायेगा वही रुक जायेगें. अब रोड़ के साथ साथ एक छोटी सी नदी बहुत रही थी उसमें पानी बिलकुल कम था. थोड़ी आगे जाकर नदी में उतरने का रास्ता बना हुआ था फिर क्या था हमने भी अपनी गाड़ी नदी में उतार दी.
कुछ देर वहां ठंडे पानी में पैर रखकर बैठे रहे और प्रकृति को महसूस किया.अब शाम ढलने लगी थी तो वहां से निकलना मुनासिब समझा और बढ़ चले अपनी अगली मंजिल अल्मोड़ा की ओर.. 8 बजे हम अल्मोड़ा पहुँच गए, सबसे पहले गाड़ी में पैट्रोल फुल करवाया और पार्किंग में लगाकर होटल ढूँढने लगे, जल्दी ही होटल मिल गया 500/ में, और हाँ यहाँ AC Room की जरूरत नही होती है, रात को मौसम काफी सुहाना होता है,. पास के ही छोटे से होटल पर खाना पैक कराने के लिए गए, बातों ही बातों में होटल मालिक ने पूछा कहाँ घूमने का प्लान है तो हमने बताया जागेश्वर महादेव फिर उसने बताया कि नजदीक ही गोल्यू देवता का मंदिर है रास्ते में ही, वो भी देखते हुए जाना और अगर टाइम हो तो शाम तक पाताल भुवनेश्वर भी जा सकते हो अच्छी जगह है, दोनों ही जगहों के बारे में मैंने सुन रखा था तो तुरंत ही हम तीनों ने सारी जगहों पर जाने का फैसला किया. होटल मालिक ने हमें पूरा रुट एक कागज पर लिखकर दे दिया...खाने से पहले बची हुई एक बोतल बीयर भी गटक गए रोहित भाई..फिर रात को कुछ देर होटल की छत पर बैठकर जगमगाते हुए शहर को निहारा और फिर सोने चल दिए.
अगले दिन 27 May को सुबह जल्दी 6 बजे उठकर नहा धोकर 7 बजने से पहले हम होटल से निकल लिए, 20-30 मिनट में ही चित्तई गोल्यू देवता मंदिर पहुँच गए ये अल्मोड़ा से 10 -15 किमी दूर है. मंदिर के आसपास खूबसूरत नजारे है. यहाँ पहुँच कर मंदिर की ख्याति का पता चलता है, दूर दूर तक लोगों में मंदिर के प्रति बहुत आस्था है, गोल्यू देवता यहाँ न्याय के देवता के रूप में फेमस हैं.लोग अपनी अपनी समस्याओं को कागज़ पर लिखकर मंदिर परिसर में बांध देते हैं, और जब उनकी समस्या का समाधान हो जाता है तब वो आकर मंदिर परिसर में घंटी 🔔 बांधकर जातें हैं.मंदिर परिसर में अनगिनत घंटियाँ 🔔🔔🔔🔔 बंधी हुई हैं.
वहाँ मंदिर में रोहित ने किसी बंदे की अर्जी भी पढ़ी जिसमें उसने कक्षा में पास कराने व अपनी प्रेमिका से शादी के बारे में लिख रखा था. भगवान गोल्यू सबकी इच्छा पूरी करे 🙏. हमने भी भगवान को नमन किया व प्रसाद चढ़ाया, यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी पुजारी जी ने आराम से दर्शन करने दिए व पूजा करवाई. बस हम कोई चिट्ठी लिखकर नहीं आए. मंदिर से बाहर आकर एक दुकान से अल्मोड़ा की फेमस बाल मिठाई ली जो हम अल्मोड़ा में नहीं ले सके थे क्योंकि सुबह बाजार बंद था. 5 -10 km आगे जाकर एक होटल पर रुके चाय पानी के लिए. यहाँ गर्मागर्म पकोड़े भी बन रहे थे तो हमने चाय और पकौड़े का आर्डर दिया. चाय पीने के लिए हम सामने वहाँ नहीं बैठे जहाँ कुर्सी डली हुईं थीं, बल्कि हम हम होटल के पीछे की तरफ बैठे जहाँ नीचे एक छोटा सा नाला बह रहा था,सामने सुंदर नजारे दिख रहे थे उसपर चाय और पकोड़े का स्वाद तो वाकई लाजवाब था ही, मजा आ गया. कभी दुबारा वहां जाना हुआ तो वहां फिर से चाय जरूर पीना चाहूंगा, हालांकि वैसे मैं चाय पीता नहीं हूँ...
यूँ ही मनमोहक नजारों का आनंद लेते हुए हम जागेश्वर धाम पहुँच गए. जागेश्वर धाम बहुत सारे मंदिरों का समूह है. मंदिर पहुँच कर पूजा अर्चना की. थोड़ी देर मंदिर परिसर में ही बैठे. बहुत शांति और सुकून मिला.सच कहूं तो यहाँ एक दिन तो ठहरना चाहिए, यही से वृद्ध जागेश्वर तक पैदल जाकर भी आ सकते हैं जो यहाँ से लगभग 5-7 किलोमीटर है, हालांकि हमारे पास टाइम नही था तो हम यही से वापस हो लिए पाताल भुवनेश्वर के लिए. रास्ते में एक जगह एक लोकल आदमी से बातचीत की और उससे माल के लिए पूछा, (माल होता है बीड़ी सिगरेट में डालकर पीने वाला नशा) उस बंदे ने हमें थोड़ा माल दिया , उनसे पहाड़ी जीवन के बारे में थोड़ी बातचीत की और आगे बढ़ चले मंजिल की ओर. रोहित ने माल भरकर सुट्टा लगाया मगर कुछ खास नशा नहीं हुआ.
With locals
रास्ते में एक होटल पर खाना खाया और यही पर सामना हुआ एक खतरनाक पौधे से नाम था बिच्छू घास. हुआ यूँ कि होटल में खाने का आर्डर देकर हम होटल के पीछे बहते हुए नाले की ओर चल दिए क्योंकि खाना बनने में अभी 20 मिनट लगने थे. नीचे जाते हुए मेरा पैर उस बिच्छू घास से टकरा गया, इसका नाम मुझे बाद में पता चला था. चप्पल पहने होने के कारण मेरे पांव के टखने के पास इसके बारीक से कांटे चुभ गऐ किसी तरह उनको निकाला, लेकिन पांव में झनझनाहट होने लगी जो तकरीबन 2 घंटे तक रही. होटल से खाना खाकर जल्दी ही निकल पड़े. रास्ते में एक जगह सड़क किनारे जंगल में 🔥 आग लगी हुई थी और ऊपर से जले हुए पेड़ों के हिस्से सड़क पर गिर रहे थे, हमने जल्दी से जले हुए पेड़ के टुकड़े को सड़क से हटाया और तुरंत वहां से निकले, एक पल के लिए वो काफी डरावना मंजर था. काफी आगे एक जगह सड़क किनारे बहुत सारे आम के पेड़ थे गाड़ी रोककर 3-4 किलो आमी तोड़ कर रख ली घर ले जाने के लिए. आगे एक जगह पहुंचे शेरा घाट. वहां एक नदी बह रही थी पानी का स्तर भी ठीक ठाक था, पुल पार कर गाड़ी साइड में लगाई और नीचे नदी की ओर उतरे. नदी मे इसलिए उतरे क्योंकि रोहित को नदी किनारे बैठ कर 2 पैग लगाने की इच्छा थी, वहां पहुँच कर देखा तो जगह जगह जली हुई लकडियाँ पडीं हुई थी मतलब वो मुर्दा घाट था तो हम वहां से वापस हो लिए.इस नदी किनारे बैठकर पीने की रोहित की इच्छा पूरी नहीं हुई, लेकिन उसकी चुल अभी खत्म नही हुई थी सो कुछ और आगे चलकर एक नाले के पास गाड़ी रोकी और नीचे नाले में उतरे, नाले में काफी ठंडा और साफ पानी बह रहा था. वहां तकरीबन 30 मिनट बैठे और रोहित और संदीप दोनों ने 2-2 पैग लगाए. इन दोनों की जोड़ी हूबहू जय वीरु जैसी है...ऐसी जगह बैठकर पीने का मजा ही कुछ और होता है. यही पर ठंडे पानी में पैर रखकर बैठने से बिच्छू खास कार्यक्रम असर ठीक हुआ था. यहाँ से आगे बढे तो 4 बजे के आसपास एक गाँव के पास पहुचे जहाँ नदी के मैदान में कुछ लड़के किक्रेट खेल रहे थे, हमने भी गाड़ी साइड में लगाई और नीचे उतर कर मैदान में पहुंच गए. वहां हमने भी खेलने की इच्छा बताई तो वो लडके हमे खिलाने पर राजी हो गए. उनमें से एक लड़का गुड़गांव में काम करता था. लगभग 1 घंटे तक उनके साथ क्रिकेट खेलने के बाद उनका शुक्रिया किया और आगे के सफर पर चल दिए.
शाम 6 बजे पाताल भुवनेश्वर से 3-4 किलोमीटर पहले एक दुकान पर मैगी खाई, वही पेड़ पर शहतूत जैसा फल देखकर उसका स्वाद चखा जब दुकानदार से उसके बारे में पूछा तो पता चला काफल नाम था उस फल का.. थोड़ी देर में पाताल भुवनेश्वर पहुँच गए. होटल लेकर वही सामने गाड़ी पार्किंग में लगा दी और गांव में घूमने चल दिए..
पाताल भुवनेश्वर गाँव
कुछ देर गाँव के खेतों की ओर घूम कर आये, आते ही होटल के सामने ढाबे वाले को खाने का आर्डर दे दिया था. जल्दी ही खाना बनकर आ गया. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ ये एक छोटा सा गाँव है, और ढाबे 8:30 बजे तक बंद हो जाते हैं,वेटर कमरे में ही खाना देने आ गया था क्योंकि ढाबा बंद करने का टाइम हो गया था,तो जल्दी ही 2-2 पैग लगाए जय वीरु की जोड़ी ने और बची हुई दारू वेटर को दे दी थी वो भी बड़ा खुश हुआ. सुबह जल्दी उठकर नहाकर पाताल भुवनेश्वर गुफा के दर्शन करने के लिए चल दिए , पास ही एक प्राचीन मंदिर है वहां भी दर्शन किए, गुफा 5 मिनट की पैदल दूरी पर ही है. लगभग 7:30 बजे के गुफा का गेट खोला गया और मोबाइल वही लाॅकर में रखवा लिए गए, क्योंकि गुफा मे फोटो खींचना व विडियो बनाना मना है. एक बार में 15-20 लोगों की एंट्री की जाती है, गुफा लगभग 80-90 फुट गहरी हैं, एंट्री करते टाइम थोड़ा डर लगता है, गुफा के अंदर का नजारा बड़ा अदभुत है, अंदर प्राकृतिक रूप से बने हुए शेषनाग, कल्पवृक्ष, शिवजी की जटाये व शिवलिंग हैं. गाइड हमे गुफा के बारे में एक एक जानकारी दे रहा था. बड़ा ही अच्छा लगा यहाँ पहुँच कर...
प्राचीन मंदिर @ पाताल भुवनेश्वर
दर्शन करके वापस ढाबे पर पहुचे नाश्ता करने के लिए, पर ढाबा बंद था 5 -10 मिनट बाद ढाबा खुला ज्यादा कुछ था नहीं तो सिर्फ चाय पी और पेमेंट किया रात के भोजन का भी बिल अभी चुकाया था. पहाड़ के लोग बड़े सीधे साधे होते हैं, ढाबे वाले अंकल ने रात को पेमेंट के बारे में कुछ नहीं कहा. कितना विश्वास करते हैं ये लोग अंजान मुसाफिरों पर भी... धन्य हैं ये लोग, सचमुच स्वर्ग में ही रह रहे हैं ये लोग.... अब अपने कमरे से बैग निकाल कर गाड़ी में रखे और कमरे की पेमेंट की और वापस चल दिए घर की ओर....
पाताल भुवनेश्वर से कुछ दूर निकलने के बाद एक नवविवाहित जोड़ी को लिफ्ट दी, उन्हें कुछ दूर गंगोलीहाट कस्बे में छोडा़. उन्होंने हमे दुबारा आने का निमंत्रण दिया, और अपना मोबाइल नंबर भी दिया. रास्ते में एक जगह नदी में नहाने उतरे, पानी का बहाव बहुत कम था कुछ देर एंजोय किया...








